"न पाने की ख़ुशी है कुछ, न खोने का ही कुछ ग़म है
ये दौलत और शोहरत सिर्फ कुछ ज़ख्मों का मरहम हैं
अजब सी कश्मकश है रोज़ जीने रोज़ मरने में
मुक़म्मल ज़िन्दगी तो है, मगर पूरी से कुछ कम है"
KUMAR VISHVASH
Monday, 6 October 2014
KISAN
अन्न हमे देने वाला क्यों आज यहाँ पर भूखा है देख रहा मौसम को बारिश बिन खेतों में सूखा है बारिश के संग ही खेतों में कब ,अब हरियाली आयेगी कब हरी भरी लहराती फसलें धन धान्य बन जाएंगी शालिनी शर्मा
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