Thursday, 23 April 2015

LIVING IN HARMONY WITH NATURE

चांहे भंवरे हों या तितली सभी को फूल भाते हैं 
मगर फूलों का है इक दर्द जिसको सब छुपाते हैं 
अगर फूलों से पूछोगे तो रोकर वो बतायेंगें 
गगन से अम्ल की बूंदे लिये क्यों मेघ आते हैँ 
है कोमल तन ना इस नाजुक बदन को अब जलाओ तुम 
छोड़ दो दुश्मनी नेचर से कुछ मैत्री निभाओ तुम 
धरा भी रो के अपने दर्द के किस्से सुनाती है 
मेरी ये कोख बिन अपराध क्यों बंजर बना दी है 
कभी जब दर्द बढ़ जाये तो वो सैलाब लाता है 
धुँआ हद से अगर बढ़ जाये तो दम घोंट जाता है 
कंही ऐसा ना हो बागी पवन का वेग हो जाये 
क्रोध से गर्म होकर बर्फ के पत्थर पिघल जायें 
हमें  तो बंद अत्याचार करना ही पड़ेगा अब 
अभी सम्भले नही तो आखिर सम्भलेंगे हम कब 
इकोसिस्टम के अत्याचार को गर रोक ना पाये 
सिवा शर्मिन्दा होने के यंहा कुछ भी ना रह जाये 
                                        शालिनी शर्मा 

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