चांहे भंवरे हों या तितली सभी को फूल भाते हैं
मगर फूलों का है इक दर्द जिसको सब छुपाते हैं
अगर फूलों से पूछोगे तो रोकर वो बतायेंगें
गगन से अम्ल की बूंदे लिये क्यों मेघ आते हैँ
है कोमल तन ना इस नाजुक बदन को अब जलाओ तुम
छोड़ दो दुश्मनी नेचर से कुछ मैत्री निभाओ तुम
धरा भी रो के अपने दर्द के किस्से सुनाती है
मेरी ये कोख बिन अपराध क्यों बंजर बना दी है
कभी जब दर्द बढ़ जाये तो वो सैलाब लाता है
धुँआ हद से अगर बढ़ जाये तो दम घोंट जाता है
कंही ऐसा ना हो बागी पवन का वेग हो जाये
क्रोध से गर्म होकर बर्फ के पत्थर पिघल जायें
हमें तो बंद अत्याचार करना ही पड़ेगा अब
अभी सम्भले नही तो आखिर सम्भलेंगे हम कब
इकोसिस्टम के अत्याचार को गर रोक ना पाये
सिवा शर्मिन्दा होने के यंहा कुछ भी ना रह जाये
शालिनी शर्मा
मगर फूलों का है इक दर्द जिसको सब छुपाते हैं
अगर फूलों से पूछोगे तो रोकर वो बतायेंगें
गगन से अम्ल की बूंदे लिये क्यों मेघ आते हैँ
है कोमल तन ना इस नाजुक बदन को अब जलाओ तुम
छोड़ दो दुश्मनी नेचर से कुछ मैत्री निभाओ तुम
धरा भी रो के अपने दर्द के किस्से सुनाती है
मेरी ये कोख बिन अपराध क्यों बंजर बना दी है
कभी जब दर्द बढ़ जाये तो वो सैलाब लाता है
धुँआ हद से अगर बढ़ जाये तो दम घोंट जाता है
कंही ऐसा ना हो बागी पवन का वेग हो जाये
क्रोध से गर्म होकर बर्फ के पत्थर पिघल जायें
हमें तो बंद अत्याचार करना ही पड़ेगा अब
अभी सम्भले नही तो आखिर सम्भलेंगे हम कब
इकोसिस्टम के अत्याचार को गर रोक ना पाये
सिवा शर्मिन्दा होने के यंहा कुछ भी ना रह जाये
शालिनी शर्मा
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